Sunday, August 14, 2016



स्वप्न सुंदरी 

तुम हो मेरी स्वप्न सुंदरी जीवन की आधार ,
चाहूँ तुमको गले लगाना आ जाओ एक बार,

तुम बिन तड़पे ये मन ऐसे जैसे चंदा बिना चकोर,
तेरे बिन न सूझे कुछ भी तू दिखती चहु ओर,

चंचल नयन हिरन के जैसे मुख है कमल समान,
कंठ सुराही अधर ज्यों दाड़िम कमर है तीर समान,

वाणी में हैं रस इतना कि मधु फीका पड़ जाये ,
तेरे मुख आभा के आगे सूरज लज्जित हो जाये, 

जब स्वतंत्र करे केशों को ऐसे लगे हैं छाये बादल ,
होकर मग्न जहाँ नृत्य करें नयन मयूर संपादल,

कठिन हुई प्रतीक्षा अब तो आ जाओ इस पार,
चाहूँ तुमको गले लगाना आ जाओ एक बार.


शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता 
(१४-अगस्त-२०१६)

Saturday, January 23, 2016

वफ़ा का बाज़ार


वफ़ा का बाज़ार

वफ़ा के भाव में खरीद ले मुझको ,
रोज़ दिल का मेरे ऐसा बाज़ार नही लगता,

सुना है हुश्न का शहरों में बाजार गरम है,
वफ़ा के दाम इतने गिर गए की खरीदार नही मिलता,

जो मेरी मुफलिसी को भूल के दिल में उतर जाये ,
मोहब्बत को समझने वाला वोह किरदार नही मिलता,

शक्ल को देखके लगा लेता हर शख्श अंदाज़ा ,
जो मेरी रूह को समझे कहीं दिलदार नही मिलता .

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(२३ -०१ -२०१६)

इंतज़ार





इंतज़ार

कुछ ख्याल भेज दे अपने की ये रातें कटती नहीं हैं,
आँखों से धुंध तेरी याद की छटती नहीं है,
जहाँ कुछ शाम को होता हैं जगमग शहर सारा,
अँधेरी रात मेरे दिल से क्यों छटती नहीं है,

धड़कता दिल है मेरा जलजले सा आजकल क्यों,
क्यों खाई दरमियान अपने ये क्यों अब पटती नहीं है,
आईना क्यों है दिखाता धुंधला अक्स मेरा,
चमक किरदार में मेरे उसे दिखती नहीं है ,

जलके खाक होता जा रहा है वज़ूद मेरा ,
ये धड़कन और तेरे बिन कहीं चलती नहीं हैं,
साँसें भी हैं थमती जा रही हैं जुड़ा होके तुमसे ,
तमन्ना मिलने की तुमसे क्यों ये थमती नहीं है,

वक़्त से तुम मेरे पास जाना क्योंकि ,
मेरी अब जिंदगी मुझसे कुछ और संभलती नहीं है .

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता

(२३ -०१ -२०१६)

Friday, November 14, 2014

प्रेम अभिलाषा


प्रेम अभिलाषा 




तुम हो अभिलाषा इस मन की पर हो सागर के पार,
कभी तो आकर ह्रदय लगा लो जीवन हो साकार,

तुम बिन फीके रंग फूल के नीरस ये मधुमय मास,
कोयल भी क्यों चुप हैं बैठी लगे भूली सुर की प्यास,
बेल बिटप पल्लव उदास हैं, रूका हुआ अलि कली का रास,
इन सबको जीवन दे सकता, तुम्हारे मुखमंडल का हास,
यूँ लगता मेरे मन उपवन से रूठी बसंत बहार,
 कभी तो आकर ह्रदय लगा लो जीवन हो साकार,

सृष्टि तो है चल रही, पर मेरा जीवन ठहर गया
सुबह समय पर होती है, पर जाने कहाँ तमहर गया
समय रूका हुआ है मानो, कि बढे तभी जब तुम आओ
मेरे जीवन की घडियाँ ही कितनी, जो हैं आओ, संग बिताओ
हम दोनो ही तो हैं, इक दूजे के जीवन का सार,
कभी तो आकर ह्रदय लगा लो जीवन हो साकार,

बिना तुम्हारे प्रिये दरस के कैसे, पूर्ण करूँ मैं कबिता ,
बिना तुम्हारे प्रेम के प्रिये ना बहे काव्य की सरिता,
आके दरस नयन को मेरे दे दो प्रिये एक बार, 
पल पल जगत है ढलता रहता, पर अजर है मेरा प्यार,

हृदय चाहता तुमको पाना, तुम बैठी सागर उस पार
तुम आओ मुझे कंठ लगाओ, जीवन हो साकार।




शैलेन्द्र गुप्ता 
(१५-नबम्बर-२०१४)

Saturday, September 20, 2014

जिंदगी



                                                                 जिंदगी 


क्यों इतने इम्तिहान लेती है तू जिंदगी,
 सब्र  कर एक दिन तुझे मैं दिखलाऊंगा,
मुझे तू जिंदगी कम आंकने की भूल न कर,
मैं अपनी कोशिशों से जल्द ही मुस्काउंगा, 

सख्त हालत कितने भी दिखा मुझको भले पत्थर बना दे,
बड़ी संजीदगी से तेरे हर सितम को अपनाउंगा,
मुझे ना चाहिए तुझसे दुनिया के खजाने,
मैं अपनों की दुआओं से ही बस पल जाऊंगा,

मत सुना चाँद सितारों की कहानी मुझको,
कोई बच्चा नही हूँ मैं जो यूँ ही बहल जाऊंगा,
मुझे आता है लड़ लड़ के किस्मत बदलना,
जरा तू सब्र कर ले मैं खुद ही संभल जाऊंगा,

बड़ा ही आ रहा है मज़ा मुझे लड़ने में तुझसे,
कड़े कर  इम्तिहान तू और मैं उतना मुस्कराऊंगा,
मुझे तू जिंदगी कम आंकने की भूल न कर,
मैं अपनी कोशिशों से जल्द ही मुस्काउंगा, 

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता 
(२०- सितम्बर-२०१४)

Friday, July 4, 2014


प्रेम बाजार

 तुम्हारी यादें ऐसी हैं जैसे कोई तेज हवा के थपेड़ों में घबराई तितली की तरह,
मेरे मन के किसी कोने में बड़ी सिद्दत से चिपक जाती है,
पर इन दिनों मैं कुछ आने वाले दिनों को सोच के परेशान हूँ,

जब प्रेम बाजार में कुछ सामान बनके रह जायेगा,
लैला मजनू,हीर रांझा एक ब्रांड नेम बन रह जायेगा,
दौलत के मानकों में बिकेगा प्रेम,
जतनी गहरी जेब उतना लम्बा प्रेम,

विस्वास और आत्मीयता का कुछ मोल न रहेगा,
टेर्रिफ के जैसे अलग अलग वैलिडिटी पे शायद,
तब लोग प्रेम बस फेसबुक और सोशल नेटवर्क पे ही दिखाये,
हो सकता है की नज़दीक बैठी यादें धुंधली पद जाये,

लेकिन मैं फिर भी तेरी यादों में एक कविता लिखूंगा,
बस ये बतलाने के लिए कि...... 
एक कवि ने रोटी की शर्त पे प्रेम बेचने से मना कर दिया 


शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता 
(०५-जुलाई -२०१४ मध्य रात्रि )

Wednesday, April 30, 2014

कभी तो

 
 
कभी तो
 
 
काश कभी तो उसकी एक झलक मिल जाये,
जो मेरे इस बीमार दिल की दवा बन जाएं,
कभी तो सुनाई दे मेरी धडकन उसको,
कभी तो मेरी हर अनसुनी दुआ कि सुनवाई हो जाये,
बड़ी मुद्दत गुजार दी ,किया दीदार दूर से,
कभी उसकी नज़र भी देख ले तो बात बन जाएं,
मैं अक्सर रात मे तेरे सपनें सजोंता हूँ,
जो ये सच मे बदल जाये तो यारा बात बन जाये,
" ऐ चाँद तुझमें मुझे अपना मेहबूब नज़र आता है,
पर ये भी सच है वोह तुझसा दूर नज़र आता है... "

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(३०-अप्रैल-२०१४)

Saturday, March 8, 2014

नारी -- त्याग और समर्पण की एक सबल मूर्ति

पहली बार जब आँख खुली तो,खुद को तेरी गोद में पाया,
तूने अपनी ममता से मुझ बच्चे को संसार दिखाया,
देर रात जब भी मैं रोया,तूने हसके गले लगाया,
रात रात जग थपकी देकर अपने कंधे पे मुझे सुलाया,
गिरते पड़ते इन क़दमों को चलना ऊँगली थाम सिखाया,

मेरी पहली टीचर बनके नैतिकता का पाठ पढ़ाया,
गलती की तो डांट लगायी,पर बाद में हसके गले लगाया,
दुनियादारी मुझे सिखाई,सही गलत के फर्क बताया,
 
दोस्त के जैसी बहिन मुझे दी,जिसने हर पल साथ निभाया,
कितना भी झगड़ा मैं करता,मेरी गलती पे मुझे मनाया,
अपना सब कुछ मुझसे बांटा,पर बदले में कुछ ना माँगा,
मेरी गलती खुदपे ले के,डांट से कितनी बार बचाया,
 
जब तू चली गयी बियाह के,खुद को बड़ा अकेला पाया,
इसी बीच प्रेयसी बनके किसी ने आके साथ निभाया,
बड़ा अधूरा लापरवाह सा, था इससे पहले मैं सच में,
पर तूने जीवन में आके मेरा हर पल हसी बनाया,
 
बदली ज़िन्दगी फिर एक बार,जब बनके जीवनसाथी तू आया,
अपने प्यार से तूने मुझको जीने का एक ढंग सिखलाया,
सुख-दुःख में परछाई बनके तूने हर पल साथ निभाया,
मेरी बुरी अादतों को भी हसके तूने गले लगाया,
मेरा घर था चारदीवारी,तूने इसमें परिवार बसाया,
 
दिया मुझे उपहार अनमोल, जब गोद में तेरी काया को पाया,
हो गया आज पूरा मैं जब पापा कहके मुझे बुलाया,
तूने खुद का अस्तित्व भुलाकर मेरे जीवन को सफल बनाया,
मेरे जीवन के हर पहलु को कितना सुन्दर सरल बनाया,
 
जाने कितने रूप में तूने,मेरा जीवन में साथ निभाया,
माँ,बहिन,प्रेयसी,पत्नी बनके हर मोड़ पे सदा प्रेम बरसाया,
आभार प्रकट करता हूँ मैं ईश हे !
जो तू नारी को धरा पे लाया।
 
शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(०८-मार्च -२०१४)

Tuesday, February 11, 2014

कुछ पल तेरे साथ

  
 
        कुछ देर और तेरी जुल्फ के साये में पनाह दे दे मुझको,
कुछ हसीं पल मैं इधर और बिताना चाहता हूँ,
बात होंठों से निकलेगी तो सुन लेंगे सब तो,
आँखों आँखों में कुछ राज़ बताना चाहता हूँ,
 
ज़िन्दगी है बड़ी बेवफा क्या यकीन करूँ,
आज कि शाम तेरे मैं संग बिताना चाहता हूँ,
उजाले दिन के बड़े तनहा गुजारे हैं मैंने,
एक हसीं शाम तेरे पहलू में बसर चाहता हूँ,
 
कितने नफरत के अँधेरे बसे हैं दुनिया में,
शम्मा-ए-मुहब्बत मैं हर कोने में जलाना चाहता हूँ,
सफ़र छोटा ही भले हो मेरी इस जिंदगी का,
पकड़ के हाँथ तेरा तय मैं करना चाहता हूँ,
 
आइना ख़ाक बतायेगा कि तू कितनी सुन्दर है,
मेरी आँखों में देख अक्स नज़र आएगा,
तू बहुत खूबसूरत महकता फूल है जिसको,
मैं अपने दिल के बगीचे में सजाना चाहता हूँ,
 
कुछ देर और तेरी जुल्फ के साये में पनाह दे दे मुझको,
कुछ हसीं पल मैं इधर और बिताना चाहता हूँ........

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(१२-फेब्रुबरी-२०१४)
 

Saturday, February 8, 2014

पिता

 
 
हे तात तुम मेरे जीवन का आधार हो,
मेरे जीवन की प्रबल शक्ति हो,
मेरे कुटुंब के सबल स्तम्भ हो,
तुम पालक तुम्ही पोषक प्रेम निर्झर विस्तार हो......
तुम्हीं परिवार का अनुशाशन हो ,
धौंस से चलने वाला प्रेम का प्रशासन हो,
तुम अप्रदर्शित अनंत प्यार हो,
परिवार के प्रतिपल स्नेह के सूत्रधार हो,
तुम रोटी तुम कपडा तुम ही मकान हो,
तुम ही हम छोटी चिड़ियों के अनंत आसमान हो,
हम हैं सुरक्षित गर तेरा सर पे हाँथ है,
तू नही तो मेरा बचपन बिलकुल अनाथ है,
अपनी इच्छाओं का करते रहे तुम त्याग,
परिवार की पूर्ति रहा सदा प्रथम ध्येय,
तू हम उंगली पकड़े बच्चों का सहारा है,
जो कभी खट्टा है तो कभी खारा है,
माँ तो कह लेती है दुखी हो तो रो लेती है,
पर तू छिपा लेता है अपने अंदर अवसादों के तूफान को,
तू तब भी ढृढ़ दिखा जब मैं घर से दूर गया,
तब भी जब दीदी विदा हुई,
पर हूँ अवगत इस बात से भी,
अश्रु की वर्षा रात हुई,
हे त्यागरूप हे सबल मूर्ति तेरा मैं वंदन करता हूँ,
हे परमपूज्य परमेश्ववर रूप मैं कोटिनमन तुम्हे करता हूँ....
 
शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(०८-०२-२०१४)
 

Sunday, January 5, 2014

माँ

 
अक्सर रातों में जग जग कर मुझको वोह थपकी देती थी,
खुद थी वोह रातों जगती,पर मुझको सपने देती थी,
 
खुद सहती थी वोह विकट धूप हमको आँचल की छाँव दिए,
न खाती थी अपना भोजन वोह हमको क्षुदा मुक्त किए,
अब भी जब भूखा सोता हूँ,जब रातों को नींद ना आती है,
आके थपकी दे दे तू माँ,मुझे तेरी याद सताती है,
 
है याद मुझे जब बचपन में जब चौक के मैं जग जाता था,
चूल्हे पे खाना जलता छोड़ तू मुझे चुपाने आती थी,
जब तक मैं सो नहीं जाता था,तू खड़ी पालना हिलाती थी,
अक्सर मेरे सोने के बाद ही तू देर से खाना खाती थी,
 
जब आता समय परीक्षा का,मुझसे ज्यादा तू जगती थी,
और मेरे अच्छे नंबरों कि भगवान् से मन्नत करती थी,
जब नंबर कुछ कम रह जाते तो पापा कि डांट से बचवाना,
बेटा मेरा अब्बल आएगा पापा को हर बार ये समझाना,
मेरी हर गलती को ओ माँ कैसे तू सदा छुपाती है,
पर जब मैं अब गलती करता हूँ,मुझे तेरी याद सताती है,
 
मैं ज्यों ज्यों हुआ बड़ा थोड़ा,मेरी हर ज़िद तूने पूरी की,
अपने बचे चुराए पैसों से मेरी हर ख्वाहिश पूरी की,
मैं कैसी भी गलती करता तू करके मांफ मुस्काती है,
पर अब जब गलती करता हूँ,क्यों आके न गले लगाती है,
 
मर्ज़ी की शादी ,मर्ज़ी का घर,विदेश में जाके रहने की ज़िद,
कहके कि बड़ा हो गया हूँ मैं अपनी तरह जीने कि ज़िद,
मुझको खुदसे रखके दूर तू कितना दुःख रही झेलती माँ,
कि कभी न उफ़ न करी शिकायत बस हसके दुआ ही देती माँ,
 
जब रही थी गिन अंतिम साँसें पापा को अक्सर ये कहना,
मत करना फोन बिजी होगा,किसी मीटिंग के बीच होगा,
वोह करना ज़िद सदा ये पापा से कि गर कभी अचानक मैं मर जाऊं,
तस्वीर मेरी कर देना मेल,डिस्टर्ब कहीं न कर देना,
बस लाल तेरा रहे सुखी सदा तू यही कामना करती रही,

तू बिरह वियोग सहती रही,मैं खुश हूँ ये कहती रही,
गयी छोड़ अकेला मुझको तू एक बार पुकारा तो होता,
कर मांफ मुझे तू जहाँ भी हो मैं बड़ा अभागा बेटा हूँ,
बिलकुल निराश मैं  लाचार यहाँ एक बार तू फिर से आ जाये,

फिर दे छाया तू आँचल कि दे थपकी मुझको सुलाये,
हर बार यही पश्चाताप कि पीड़ा आँख नम कर जाती है,
आके थपकी दे दे तू माँ,मुझे तेरी याद सताती है !
 
 
शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(०५-जनवरी -२०१४ )
 

 
 

Saturday, December 21, 2013

रंगमंच या जीवन

 
 
 
 जीवन के इस रंगमंच पे कभी हसे तो रोये कभी,
कभी चखे पकवान ख़ुशी के दुःख के व्यंजन चखे कभी,
हर दिन हैं यहाँ पात्र बदलते नयी भूमिका कथा नयी,
परदे के पीछे हैं चलती अनजानी पटकथा कई,
ऐसे ही रंगमंच के जैसे अपना भी जीवन चलता,
हम भी कथा बदल पाते तो सब कुछ कितना सुन्दर होता,
बचपन को लम्बा कर लेता जब चाहे वोह पल जी लेता,
दुःख के सब दृश्य छांट देता बूढ़ा फिर कोई नहीं होता,
अपनों के सदा निकट रहता न जाता दूर जीविका को,
त्यौहार मनाता साथ सभी होता वंचित न कभी कहीं,
सहसा मन में आया विचार रंगमंच सा यदि जीवन होता,
सब कुछ होता बस पूर्वनियोजित कल का न कुछ रहस्य होता,
कुछ सोचो दुःख जो नहीं होता तो सुख का स्वाद नहीं चलता,
यदि रहते सदा ही बचपन में तो तरुणता का दायित्व कौन लेता,
न जाते घर से दूर अगर तो नए दोस्त कैसे मिलते,
कितना सीमित जीवन होता कितना सीमित कुटुंब होता,
तो आओ करे अभिनय मिलके जीवन के रंगमंच पे सब,
परमेश्वर है जब कथाकार तो अन्त भला होगा ही तब.
 
 

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
२१-दिसंबर-२०१३
 

Saturday, October 19, 2013

विरहाग्नि

 
 
 
 आँख की गगरी हमारी हर रात छलछलाती रही,
कोशिश बड़ी की भूलने की पर याद वोह आती रही,
 
मन ही मन कुछ अबसाद उमड़े,
बंद आँखों में कहीं,
अश्रु की धारा भी सूखी,पर आँख मुस्काती रही…
 
सांझ की ठंडी हवा अब तक जो देती थी सुकून,
आज कुछ ऐसी लगी जैसे की मन झुलसा गयी…
 
वोह समुन्दर के किनारे साथ चलना संग तेरे,
उन हसी लम्हों की यादें फिर मुझे तड़पा गयी…
 
बारिशें अब भी बरसती हैं मेरे इस गाँव में,
अब मगर बरसी वोह ऐसे अम्ल सी झुलसा गयी…
 
शाम को अब भी कभी होता भरम तू पास है,
पर अकेलेपन की आहट हर पल चिढ़ाती गयी ……
.
मन को तसल्ली दे न सका मैं ,ढूँढा तुझे जब याद में,
आँखों को मैं मूँदके नींदों को भरमाती रही…. 
 
तू न आया याद में तेरी मैं ये आँख डब डबाती गयी,
कोशिश बड़ी की भूलने की पर याद वोह आती रही…….

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(२०-अक्टूबर-२०१३)

Saturday, October 5, 2013

समझो न कुछ तो...

 
 
 
दरिया-ए मोह्हबत में कश्ती थी जवानी  की,
ज़ज्बातें-तूफ़ान था इक अलग ही नज़ारा था,
महबूब था बाँहों में,हसरत थी निगाहों में,
एक सुरूर सा छाया था,लफ्जों में जो आया था,
 
उसकी नज़र ने पूंछा ऐसे ही इशारों में,
हमको भी तो बताओ किस कशमकश में हो तुम,
नज़रें झुकाके हसके हम उसको चूम बैठे,
बोले तुम्ही समझ लो क्या लफ्ज़ जरूरी हैं,
 
जब तार हो जुड़े एक दिल के दुसरे के ,
नज़रों ही समझ लो क्यों अलफ़ाज़ जाया करना,
वोह हँसके उसपे बोले इज़हार ज़रूरी है,
लफ़्ज़ों की रूहानियत का इकरार ज़रूरी है,
 
हमने भी बड़ी सिद्दत से उनको गले लगाके,
हलके से कान में फिर सब कह दिया की क्या है,
ये आँखें हैं मेरी दुनिया मुझे क्या कुछ जगह दोगी,
मुझे तुमसे है मोहब्बत,क्या साथ मेरा दोगी,
 
वोह फिर कुछ सोच के बोली की इतनी देर क्यों कर दी,
बड़े बुद्धहू  हो तुम भी इशारे जो नही समझे,
बड़ी सिद्दत से तुमको चाहती तुम ये समझ लो तुम,
की ज़न्मो साथ चलने का मैं वादा आज करती हूँ .....
 
 
शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(५-अक्टूबर-२०१३)

 

Saturday, September 28, 2013

परिवर्तन से सम्रद्धि लाओ

 
 
 
लघु सोच के बृहद समाज की परिवर्तन लायेगा कौन,
कुरीतियों की CO२ में बदलाव की ओक्सीज़ऩ घोलेगा कौन,
क्यों जकड़े हैं संकीर्ण भावों में,
क्यों अन्दर का गाँधी हैं मौन ?? 
 
सब लिप्त हैं बस दोषारोपण में,
क्यों अपने दोष नहीं दिखते,
बस दिखता हैं उन्हें निजी-स्वार्थ,
हित राष्ट्र का कैसे छिप जाता...
 
है जन-समाज ब्रश्चिक जैसा,
न बढता न बढने देता,
जिस लहर में अपना स्वार्थ दिखा
उस लहर में आगे बढ लेता,
न चिंता है न कुछ चिंतन
पर करे प्रतीक्षा उनका मन,
बस जग ये हो जाये सुन्दर
उनका घर हो जाये सुन्दर,
पर बिना प्रयास क्या ये संभव
गर मौन-दर्शी बस रहेंगे सब?
 
गर सपना है सम्रद्धि का,
तो फिर प्रयास करना होगा
ये राष्ट्र सभी से बनता है
अपना कर्तव्य समझना होगा....
 
मत करो प्रतीक्षा जिम्मा लो
खुद बढ़ो औरों को बढवाओ,
तुमसे है राष्ट्र और इसके हो तुम
परिवर्तन से सम्रद्धि लाओ
 
 
 

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(२८ सितम्बर २०१३ )
 

माँ तेरी गोद में

 
 
 
 
बड़ी सुखद अनुभूति है माँ  तेरी गोद की ,
अद्भुत  स्वर्णिम प्रीति है माँ  तेरी गोद में,
कोई स्वार्थ नही बस ममता के बादल जहाँ उमड़ते हैं,
ममत्व की बस बारिश है,इस सुन्दर सहज परिवेश में...
 
तेरे स्पर्श मात्र से ही सब कष्ट मिट जाते हैं,
ह्रदय आह्लादित हो उठता है,अधर सहज मुस्काते हैं,
कितनी शीतल कितनी निर्मल तेरे आँचल की छाया है,
शायद ये कोई पुण्य है मेरा,जो मैंने तुमको पाया है...
 
हे मात तुझे है कोटि नमन,हैं धन्य हुआ जीवन मेरा,
सच है मैं कितना भाग्यवान,जो तेरी मुझपे छाया है,
हे ईश मुझे इस योग्य बना,खुशियाँ इस आँचल में भर पाउं,
इन आँखों में बस खुशियाँ देखूं,इन चरणों में ही मर जाउं....
 
 

                                                   शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
                                                (२८ सितम्बर २०१३ )

Saturday, September 21, 2013

अतिथि मेरे ह्रदय कुटीर के



"  तितलियों के  पंखों  जैसी  रंग  बिरंगी  दुनिया  मेरी ,
जहाँ  वास  करते  थे  सहज  ही  स्वप्न  के  अतिथि  ह्रदय  कुटीर  में ,
बचपन  की  मासूम  छवि  संग ,सदा  ढूढ़ते  हर्ष  की  लहरें ,
था  ये जग बस  सुन्दर  दिखता,  उस  कुटीर  की  हर  खिड़की  से ....
सुख -समृधि थी चहुओर बस ,रहते  थे  सब  भ्रात  भाव  से ,
राग -द्वेष  न  जाति-भेद  कुछ ,थे  आलाह्दित  हर  उत्सव  में ,
राम -रहीम  क्या  नानक -जीसस ,बसता था बस  इन्सान  दिल  में ..
साथ  मनाते ईद-दिवाली,लोहरी-क्रिसमस इस  कुटीर के लघु आँगन  में ,
जग में थी बस समता  फैली,नही विसमता का निशान था,
पुत्र जहाँ थे श्रावण के जैसे,सीता-सम नारी का मान था ....


किन्तु मन ये नहीं था अवगत जीवन के उस कटु यतार्थ से,
की जग ऐसे नहीं है चलता सहज भावों की आभिव्यक्ति से,
बचपन का सुख बस बना कल्पना ,ग्रषित हुआ जग बाल्य-श्रम से,
सुख समृद्धि बस हुई धनाड्यों की,कंटक हैं पथ में गरीब के.....
भाई को अब भाई न भाता,घर में हैं कई आँगन दिखते,
जाति-धर्म के नाम पे लड़ते रक्त पिपासु लोग हैं दिखते,
मात्र-पिता कर रहे समर्पित वृधास्रम में पुत्र आजके,
नारी का अब मान रहा न,लाज को आँचल बेवस दिखते,
पाप ,गरीबी भ्रष्ट व्यबस्था,रक्षक भी अब  भक्षक दिखते,
छिन्न-भिन्न अबशेष हैं दिखते,धुंधले से उस स्वप्न कुटीर के,


जाने कब कर गए पलायन हाय वोह अतिथि ह्रदय कुटीर के.......  "


                                   शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
                                 (२२-सितम्बर-२०१३ )


 

ज़रा सम्भाल के ..............

 
 
 
 
                                             
यूँ प्यार में दामन छुड़ाया नहीं करते ,
करके वादे यूँ मुकर जाया नही करते,
खुदा भी रूठ जाता है ये अदा अच्छी नही है,
जो तुम्हे चाहे उसका दिल दुखाया नही करते,
ज़रा सी बात का यहाँ बन जाता है फ़साना,
सखी को भी दिल की बात बताया नही करते,
कोई हो जाये दीवाना समझ बैठे गलत मतलब,
सबके सामने यूँ मंद मंद मुस्काया नही करते .....





 

बेचारा पति ...

 
 
 
 
 
 
          
"  सच कहूँ शादी से पहले मैं बड़ा था हैण्डसम ,
पर हुई शादी है जबसे हो गया हूँ हैंडपंप ,
हो गया हूँ हैंडपंप पत्नी का पानी भरता हूँ,
है ये आलम मौत से ज्यादा पत्नी से डरता हूँ,
जब कभी शौपिंग को मैडम मार्किट ले जाती मुझे,
समझ शौपिंग बैग कुली सा लाद देती है मुझे,
घर में नौकर बीवी का बच्चों का बनता हूँ खिलौना,
कद तो छह फुट है मेरा बीवी के आगे दीखता बौना,
सोचता था बाद शादी के उठाऊंगा मैं सुख,
क्या था पता धोबी सुबह को शाम को बनना है कुक,
देता नसीहत शादी के गद्दे में यारों मत गिरो,
वरना बन रह जाओगे आइटम कोई USE & THROUGH ......"