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Saturday, October 19, 2013

विरहाग्नि

 
 
 
 आँख की गगरी हमारी हर रात छलछलाती रही,
कोशिश बड़ी की भूलने की पर याद वोह आती रही,
 
मन ही मन कुछ अबसाद उमड़े,
बंद आँखों में कहीं,
अश्रु की धारा भी सूखी,पर आँख मुस्काती रही…
 
सांझ की ठंडी हवा अब तक जो देती थी सुकून,
आज कुछ ऐसी लगी जैसे की मन झुलसा गयी…
 
वोह समुन्दर के किनारे साथ चलना संग तेरे,
उन हसी लम्हों की यादें फिर मुझे तड़पा गयी…
 
बारिशें अब भी बरसती हैं मेरे इस गाँव में,
अब मगर बरसी वोह ऐसे अम्ल सी झुलसा गयी…
 
शाम को अब भी कभी होता भरम तू पास है,
पर अकेलेपन की आहट हर पल चिढ़ाती गयी ……
.
मन को तसल्ली दे न सका मैं ,ढूँढा तुझे जब याद में,
आँखों को मैं मूँदके नींदों को भरमाती रही…. 
 
तू न आया याद में तेरी मैं ये आँख डब डबाती गयी,
कोशिश बड़ी की भूलने की पर याद वोह आती रही…….

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(२०-अक्टूबर-२०१३)

Saturday, September 28, 2013

परिवर्तन से सम्रद्धि लाओ

 
 
 
लघु सोच के बृहद समाज की परिवर्तन लायेगा कौन,
कुरीतियों की CO२ में बदलाव की ओक्सीज़ऩ घोलेगा कौन,
क्यों जकड़े हैं संकीर्ण भावों में,
क्यों अन्दर का गाँधी हैं मौन ?? 
 
सब लिप्त हैं बस दोषारोपण में,
क्यों अपने दोष नहीं दिखते,
बस दिखता हैं उन्हें निजी-स्वार्थ,
हित राष्ट्र का कैसे छिप जाता...
 
है जन-समाज ब्रश्चिक जैसा,
न बढता न बढने देता,
जिस लहर में अपना स्वार्थ दिखा
उस लहर में आगे बढ लेता,
न चिंता है न कुछ चिंतन
पर करे प्रतीक्षा उनका मन,
बस जग ये हो जाये सुन्दर
उनका घर हो जाये सुन्दर,
पर बिना प्रयास क्या ये संभव
गर मौन-दर्शी बस रहेंगे सब?
 
गर सपना है सम्रद्धि का,
तो फिर प्रयास करना होगा
ये राष्ट्र सभी से बनता है
अपना कर्तव्य समझना होगा....
 
मत करो प्रतीक्षा जिम्मा लो
खुद बढ़ो औरों को बढवाओ,
तुमसे है राष्ट्र और इसके हो तुम
परिवर्तन से सम्रद्धि लाओ
 
 
 

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(२८ सितम्बर २०१३ )
 

Saturday, September 21, 2013

अतिथि मेरे ह्रदय कुटीर के



"  तितलियों के  पंखों  जैसी  रंग  बिरंगी  दुनिया  मेरी ,
जहाँ  वास  करते  थे  सहज  ही  स्वप्न  के  अतिथि  ह्रदय  कुटीर  में ,
बचपन  की  मासूम  छवि  संग ,सदा  ढूढ़ते  हर्ष  की  लहरें ,
था  ये जग बस  सुन्दर  दिखता,  उस  कुटीर  की  हर  खिड़की  से ....
सुख -समृधि थी चहुओर बस ,रहते  थे  सब  भ्रात  भाव  से ,
राग -द्वेष  न  जाति-भेद  कुछ ,थे  आलाह्दित  हर  उत्सव  में ,
राम -रहीम  क्या  नानक -जीसस ,बसता था बस  इन्सान  दिल  में ..
साथ  मनाते ईद-दिवाली,लोहरी-क्रिसमस इस  कुटीर के लघु आँगन  में ,
जग में थी बस समता  फैली,नही विसमता का निशान था,
पुत्र जहाँ थे श्रावण के जैसे,सीता-सम नारी का मान था ....


किन्तु मन ये नहीं था अवगत जीवन के उस कटु यतार्थ से,
की जग ऐसे नहीं है चलता सहज भावों की आभिव्यक्ति से,
बचपन का सुख बस बना कल्पना ,ग्रषित हुआ जग बाल्य-श्रम से,
सुख समृद्धि बस हुई धनाड्यों की,कंटक हैं पथ में गरीब के.....
भाई को अब भाई न भाता,घर में हैं कई आँगन दिखते,
जाति-धर्म के नाम पे लड़ते रक्त पिपासु लोग हैं दिखते,
मात्र-पिता कर रहे समर्पित वृधास्रम में पुत्र आजके,
नारी का अब मान रहा न,लाज को आँचल बेवस दिखते,
पाप ,गरीबी भ्रष्ट व्यबस्था,रक्षक भी अब  भक्षक दिखते,
छिन्न-भिन्न अबशेष हैं दिखते,धुंधले से उस स्वप्न कुटीर के,


जाने कब कर गए पलायन हाय वोह अतिथि ह्रदय कुटीर के.......  "


                                   शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
                                 (२२-सितम्बर-२०१३ )


 

Saturday, August 24, 2013

मुझपे है ये आरोप की हाय,क्यों मैं बेटी हूँ !!


         Mujh pe hai ye aarop ki haye,kyon main beti hoon !!



क्यों  समझते  हैं  मुझे  वोह  भूल  अपनी ,
मैं  भी  तो  उनके  प्रेम  की  परछाई  हूँ ,
हे  ईश फिर  क्या  पाप  हो  गया  हा  मुझसे  ,
जो  जनम  लेते  ही  न  उनको  भायी हूँ ….
क्यों  माँ  है  मेरी  परिजनों  के  संताप  सहती ,
हैं  झेल  जाती  सब  कुछ  मगर  न  शब्द  कहती ,
लगता  है  यूँ  की  सब  कलह  के  बीज  को  खुद  में  समेटी  हूँ ,
मुझ  पे  है  ये  आरोप  की हाय ,क्यों  मैं  बेटी  हूँ  !
थी  गर्भ  में  मैं  सोचती  की  सबका  स्नेह  मिलगा ,
मैं  भी  सुशोभित  कर  सकुंगी  आगन  को  सारे ,
हर्षित  करुँगी  मैं  सभी  को  अपनी  किलकारियों  से ,
होता  सुसज्जित  हैं  बगीचा  जैसे  क्यारियों  से ,
पर  हाय  कैसा  सामने  ये  द्रश्य  है ,
हर  ओर सबमे  घृणा   का  परिद्रश्य  है ....
चुप  चाप  मृत  सी  आज  मैं  खामोश  लेटी  हूँ ,
मुझ  पे  है  आरोप  की  हाय ,क्यों  मैं  बेटी  हूँ  !!
क्यों  भूल  जाते  लोग  हैं  सब  त्याग  सारे ,
बेटी ,बहिन  और  माँ  के  रूप  में  हैं  जो  हम  करते ,
हैं  भूल  जाते  अपनी  ख़ुशी  उनकी  ख़ुशी  में ,
कुछ  तो  बताओ  क्या  हैं  हम  कुछ  पाप  करते ...
हम  तो  हैं  कर  देते  समर्पित  जीवन  सहज  ही  भाव  से ,
फिर  हैं  क्यों  वंचित  आज हम  अपनों  की  स्नेह  छाव  से .....
इतनी  उपेच्छित  पर  हिये  में  ममत्व  ही  समेटी  हूँ ,
फिर  क्यों  है  ये  आरोप  मुझपे , की  हाय  मैं  बस  बेटी  हूँ .....

Friday, August 9, 2013

हैं मेरे प्रयास हारे पर नहीं आशा है हारी....



             

        Hain Mere Prayas Haare Par Nahi Aasha Hai Haari

 
         



" है मुझे घेरी  निराशा  फिर  भी  लड़ते  जा  रहा  हूँ ,
हौसला अब भी  है  जिंदा  जानता  हूँ  है  जीत  आगे ,
हैं  मेरे  प्रयास  हारे  पर  नहीं  आशा  है  हारी ,
जीत  मेरी  है  सुनिश्चित  बस  दो  कदम  चलना  है  आगे....
मुझको  नही  इतना  है  संशय  की  जीत  तो  मेरी  है  होनी ,
पर  सहज  मिल  जाये  ऐसी  जीत  में  फिर  स्वाद  क्या  है ,
लड़ता  तो  वोह  सूर्य  भी  है  रात्रि  के  गहरे  तिमिर  से ,
और  लहरें  भी  निरंतर  सागरों  से  युद्ध  करती ,
पर  यदि  थक  जाये  ये  तो  क्या  हमे  मिलता  सवेरा ,
पर  वहीँ  ये  सत्य  भी  है  कि बिन  तिमिर  क्या  है  सवेरा .....
जय  पराजय  और  सुख  दुःख  है  अधूरे  बिन  एक  दूजे ,
हो  न  दुःख  जो  ज़िन्दगी  में  तो  कौन  परमेश्वर  को  पूजे ...
तो  लड़  निरंतर  विफलताओं  से  अपनी  जीत  है  प्रत्यक्ष  तेरे ,
दुःख  की  ये  रातें  छनिक  है  और  सुख  के  हैं  लम्बे  सवेरे ,
उठ  खड़ा  हो  तू  धैर्य  मत  खो  छट  रहे  हैं  ये  अँधेरे ,
आगे  बस  स्वर्णिम  सुबह  है  होंगे  सफल  प्रयास  तेरे ,
हार  मत  लड़ता  ही  जा  वोह  देख  छट रहे हैं  अँधेरे ,
जीत  तेरी  है  सुनिश्चित  बस  दो  कदम  चलना  है  आगे ..... "