Saturday, August 24, 2013

मुझपे है ये आरोप की हाय,क्यों मैं बेटी हूँ !!


         Mujh pe hai ye aarop ki haye,kyon main beti hoon !!



क्यों  समझते  हैं  मुझे  वोह  भूल  अपनी ,
मैं  भी  तो  उनके  प्रेम  की  परछाई  हूँ ,
हे  ईश फिर  क्या  पाप  हो  गया  हा  मुझसे  ,
जो  जनम  लेते  ही    उनको  भायी हूँ ….
क्यों  माँ  है  मेरी  परिजनों  के  संताप  सहती ,
हैं  झेल  जाती  सब  कुछ  मगर    शब्द  कहती ,
लगता  है  यूँ  की  सब  कलह  के  बीज  को  खुद  में  समेटी  हूँ ,
मुझ  पे  है  ये  आरोप  की हाय ,क्यों  मैं  बेटी  हूँ  !
थी  गर्भ  में  मैं  सोचती  की  सबका  स्नेह  मिलगा ,
मैं  भी  सुशोभित  कर  सकुंगी  आगन  को  सारे ,
हर्षित  करुँगी  मैं  सभी  को  अपनी  किलकारियों  से ,
होता  सुसज्जित  हैं  बगीचा  जैसे  क्यारियों  से ,
पर  हाय  कैसा  सामने  ये  द्रश्य  है ,
हर  ओर सबमे  घृणा   का  परिद्रश्य  है ....
चुप  चाप  मृत  सी  आज  मैं  खामोश  लेटी  हूँ ,
मुझ  पे  है  आरोप  की  हाय ,क्यों  मैं  बेटी  हूँ  !!
क्यों  भूल  जाते  लोग  हैं  सब  त्याग  सारे ,
बेटी ,बहिन  और  माँ  के  रूप  में  हैं  जो  हम  करते ,
हैं  भूल  जाते  अपनी  ख़ुशी  उनकी  ख़ुशी  में ,
कुछ  तो  बताओ  क्या  हैं  हम  कुछ  पाप  करते ...
हम  तो  हैं  कर  देते  समर्पित  जीवन  सहज  ही  भाव  से ,
फिर  हैं  क्यों  वंचित  आज हम  अपनों  की  स्नेह  छाव  से .....
इतनी  उपेच्छित  पर  हिये  में  ममत्व  ही  समेटी  हूँ ,
फिर  क्यों  है  ये  आरोप  मुझपे , की  हाय  मैं  बस  बेटी  हूँ .....

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