Khushiyan Bula Rahi Hain...
" रिश्तें निभा रहे हैं या रिश्ते बचा रहे हैं ,
हम जानते हैं की जिंदगी मशरूफ हो चली है ...अब भी है याद मुझको जब साथ बैठते थे ,
लम्हों की गुफ्तगू में वोह अहसास ढूंढते थे,
दुनिया के सारे काम भी दरकिनार किया करते थे ,
दिल में दीदार -इ -यार की जब हशरत हुआ करती थी ...
शायद इस ज़िन्दगी में यूँ मशगूल हो गये है ,
की ज़ज्बात और रिश्तों का अब मोल खो गया है ,
दौलत कमाने की होड़ में इस कदर लगे हुए हैं ,
मन के सुकून से तो काफी दूर हो चले हैं .....
हुई नहीं है देर अब भी सोच के तो देख तू ,
मुड़के तो देख अपने तेरे राह देखते हैं ,
दो पल गुजार चाय पे यारों के साथ फिर से ,
सर को तू फिर गोद में माँ की तो दाल के देख ,
वोह भीग फिर से बारिशों में ,
वोह बर्फ के गोले की मिठास एक बार फिर से जीभ से तो चाख के देख ....
ज़िन्दगी अब भी बुलाती है तुझको खुशियाँ वही खडी हैं ,
मस्गूलियत का चस्मा नज़र से एक बार तो उतार के देख ....... "
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