Friday, August 9, 2013

खुशियाँ बुला रही हैं...





         Khushiyan Bula Rahi Hain...





" रिश्तें  निभा  रहे  हैं  या  रिश्ते  बचा  रहे  हैं ,
हम  जानते  हैं  की जिंदगी  मशरूफ हो  चली  है ...
अब  भी  है याद  मुझको  जब  साथ  बैठते  थे ,
लम्हों  की  गुफ्तगू  में  वोह  अहसास  ढूंढते  थे,
दुनिया  के  सारे  काम  भी  दरकिनार किया  करते  थे ,
दिल  में  दीदार - -यार  की  जब  हशरत  हुआ  करती  थी ...
शायद  इस  ज़िन्दगी  में  यूँ  मशगूल  हो  गये  है ,
की  ज़ज्बात  और  रिश्तों  का  अब  मोल  खो  गया है ,
दौलत  कमाने  की  होड़  में  इस  कदर  लगे  हुए  हैं ,
मन के सुकून  से  तो  काफी  दूर  हो  चले  हैं .....
हुई  नहीं  है  देर  अब  भी  सोच  के  तो  देख  तू ,
मुड़के तो  देख  अपने  तेरे  राह  देखते  हैं ,
दो  पल  गुजार  चाय  पे  यारों  के  साथ  फिर  से ,
सर  को  तू  फिर  गोद  में  माँ  की  तो  दाल  के  देख ,
वोह  भीग  फिर  से  बारिशों  में ,
वोह  बर्फ  के  गोले  की  मिठास  एक  बार फिर  से जीभ से तो  चाख  के  देख ....
ज़िन्दगी अब भी  बुलाती  है  तुझको  खुशियाँ  वही  खडी हैं ,
मस्गूलियत  का  चस्मा  नज़र  से  एक  बार  तो  उतार  के  देख ....... "

 
 

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