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Saturday, September 21, 2013

अतिथि मेरे ह्रदय कुटीर के



"  तितलियों के  पंखों  जैसी  रंग  बिरंगी  दुनिया  मेरी ,
जहाँ  वास  करते  थे  सहज  ही  स्वप्न  के  अतिथि  ह्रदय  कुटीर  में ,
बचपन  की  मासूम  छवि  संग ,सदा  ढूढ़ते  हर्ष  की  लहरें ,
था  ये जग बस  सुन्दर  दिखता,  उस  कुटीर  की  हर  खिड़की  से ....
सुख -समृधि थी चहुओर बस ,रहते  थे  सब  भ्रात  भाव  से ,
राग -द्वेष  न  जाति-भेद  कुछ ,थे  आलाह्दित  हर  उत्सव  में ,
राम -रहीम  क्या  नानक -जीसस ,बसता था बस  इन्सान  दिल  में ..
साथ  मनाते ईद-दिवाली,लोहरी-क्रिसमस इस  कुटीर के लघु आँगन  में ,
जग में थी बस समता  फैली,नही विसमता का निशान था,
पुत्र जहाँ थे श्रावण के जैसे,सीता-सम नारी का मान था ....


किन्तु मन ये नहीं था अवगत जीवन के उस कटु यतार्थ से,
की जग ऐसे नहीं है चलता सहज भावों की आभिव्यक्ति से,
बचपन का सुख बस बना कल्पना ,ग्रषित हुआ जग बाल्य-श्रम से,
सुख समृद्धि बस हुई धनाड्यों की,कंटक हैं पथ में गरीब के.....
भाई को अब भाई न भाता,घर में हैं कई आँगन दिखते,
जाति-धर्म के नाम पे लड़ते रक्त पिपासु लोग हैं दिखते,
मात्र-पिता कर रहे समर्पित वृधास्रम में पुत्र आजके,
नारी का अब मान रहा न,लाज को आँचल बेवस दिखते,
पाप ,गरीबी भ्रष्ट व्यबस्था,रक्षक भी अब  भक्षक दिखते,
छिन्न-भिन्न अबशेष हैं दिखते,धुंधले से उस स्वप्न कुटीर के,


जाने कब कर गए पलायन हाय वोह अतिथि ह्रदय कुटीर के.......  "


                                   शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
                                 (२२-सितम्बर-२०१३ )