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Friday, July 4, 2014


प्रेम बाजार

 तुम्हारी यादें ऐसी हैं जैसे कोई तेज हवा के थपेड़ों में घबराई तितली की तरह,
मेरे मन के किसी कोने में बड़ी सिद्दत से चिपक जाती है,
पर इन दिनों मैं कुछ आने वाले दिनों को सोच के परेशान हूँ,

जब प्रेम बाजार में कुछ सामान बनके रह जायेगा,
लैला मजनू,हीर रांझा एक ब्रांड नेम बन रह जायेगा,
दौलत के मानकों में बिकेगा प्रेम,
जतनी गहरी जेब उतना लम्बा प्रेम,

विस्वास और आत्मीयता का कुछ मोल न रहेगा,
टेर्रिफ के जैसे अलग अलग वैलिडिटी पे शायद,
तब लोग प्रेम बस फेसबुक और सोशल नेटवर्क पे ही दिखाये,
हो सकता है की नज़दीक बैठी यादें धुंधली पद जाये,

लेकिन मैं फिर भी तेरी यादों में एक कविता लिखूंगा,
बस ये बतलाने के लिए कि...... 
एक कवि ने रोटी की शर्त पे प्रेम बेचने से मना कर दिया 


शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता 
(०५-जुलाई -२०१४ मध्य रात्रि )

Saturday, September 28, 2013

परिवर्तन से सम्रद्धि लाओ

 
 
 
लघु सोच के बृहद समाज की परिवर्तन लायेगा कौन,
कुरीतियों की CO२ में बदलाव की ओक्सीज़ऩ घोलेगा कौन,
क्यों जकड़े हैं संकीर्ण भावों में,
क्यों अन्दर का गाँधी हैं मौन ?? 
 
सब लिप्त हैं बस दोषारोपण में,
क्यों अपने दोष नहीं दिखते,
बस दिखता हैं उन्हें निजी-स्वार्थ,
हित राष्ट्र का कैसे छिप जाता...
 
है जन-समाज ब्रश्चिक जैसा,
न बढता न बढने देता,
जिस लहर में अपना स्वार्थ दिखा
उस लहर में आगे बढ लेता,
न चिंता है न कुछ चिंतन
पर करे प्रतीक्षा उनका मन,
बस जग ये हो जाये सुन्दर
उनका घर हो जाये सुन्दर,
पर बिना प्रयास क्या ये संभव
गर मौन-दर्शी बस रहेंगे सब?
 
गर सपना है सम्रद्धि का,
तो फिर प्रयास करना होगा
ये राष्ट्र सभी से बनता है
अपना कर्तव्य समझना होगा....
 
मत करो प्रतीक्षा जिम्मा लो
खुद बढ़ो औरों को बढवाओ,
तुमसे है राष्ट्र और इसके हो तुम
परिवर्तन से सम्रद्धि लाओ
 
 
 

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(२८ सितम्बर २०१३ )