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Sunday, August 14, 2016



स्वप्न सुंदरी 

तुम हो मेरी स्वप्न सुंदरी जीवन की आधार ,
चाहूँ तुमको गले लगाना आ जाओ एक बार,

तुम बिन तड़पे ये मन ऐसे जैसे चंदा बिना चकोर,
तेरे बिन न सूझे कुछ भी तू दिखती चहु ओर,

चंचल नयन हिरन के जैसे मुख है कमल समान,
कंठ सुराही अधर ज्यों दाड़िम कमर है तीर समान,

वाणी में हैं रस इतना कि मधु फीका पड़ जाये ,
तेरे मुख आभा के आगे सूरज लज्जित हो जाये, 

जब स्वतंत्र करे केशों को ऐसे लगे हैं छाये बादल ,
होकर मग्न जहाँ नृत्य करें नयन मयूर संपादल,

कठिन हुई प्रतीक्षा अब तो आ जाओ इस पार,
चाहूँ तुमको गले लगाना आ जाओ एक बार.


शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता 
(१४-अगस्त-२०१६)

Tuesday, February 11, 2014

कुछ पल तेरे साथ

  
 
        कुछ देर और तेरी जुल्फ के साये में पनाह दे दे मुझको,
कुछ हसीं पल मैं इधर और बिताना चाहता हूँ,
बात होंठों से निकलेगी तो सुन लेंगे सब तो,
आँखों आँखों में कुछ राज़ बताना चाहता हूँ,
 
ज़िन्दगी है बड़ी बेवफा क्या यकीन करूँ,
आज कि शाम तेरे मैं संग बिताना चाहता हूँ,
उजाले दिन के बड़े तनहा गुजारे हैं मैंने,
एक हसीं शाम तेरे पहलू में बसर चाहता हूँ,
 
कितने नफरत के अँधेरे बसे हैं दुनिया में,
शम्मा-ए-मुहब्बत मैं हर कोने में जलाना चाहता हूँ,
सफ़र छोटा ही भले हो मेरी इस जिंदगी का,
पकड़ के हाँथ तेरा तय मैं करना चाहता हूँ,
 
आइना ख़ाक बतायेगा कि तू कितनी सुन्दर है,
मेरी आँखों में देख अक्स नज़र आएगा,
तू बहुत खूबसूरत महकता फूल है जिसको,
मैं अपने दिल के बगीचे में सजाना चाहता हूँ,
 
कुछ देर और तेरी जुल्फ के साये में पनाह दे दे मुझको,
कुछ हसीं पल मैं इधर और बिताना चाहता हूँ........

शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(१२-फेब्रुबरी-२०१४)
 

Saturday, October 5, 2013

समझो न कुछ तो...

 
 
 
दरिया-ए मोह्हबत में कश्ती थी जवानी  की,
ज़ज्बातें-तूफ़ान था इक अलग ही नज़ारा था,
महबूब था बाँहों में,हसरत थी निगाहों में,
एक सुरूर सा छाया था,लफ्जों में जो आया था,
 
उसकी नज़र ने पूंछा ऐसे ही इशारों में,
हमको भी तो बताओ किस कशमकश में हो तुम,
नज़रें झुकाके हसके हम उसको चूम बैठे,
बोले तुम्ही समझ लो क्या लफ्ज़ जरूरी हैं,
 
जब तार हो जुड़े एक दिल के दुसरे के ,
नज़रों ही समझ लो क्यों अलफ़ाज़ जाया करना,
वोह हँसके उसपे बोले इज़हार ज़रूरी है,
लफ़्ज़ों की रूहानियत का इकरार ज़रूरी है,
 
हमने भी बड़ी सिद्दत से उनको गले लगाके,
हलके से कान में फिर सब कह दिया की क्या है,
ये आँखें हैं मेरी दुनिया मुझे क्या कुछ जगह दोगी,
मुझे तुमसे है मोहब्बत,क्या साथ मेरा दोगी,
 
वोह फिर कुछ सोच के बोली की इतनी देर क्यों कर दी,
बड़े बुद्धहू  हो तुम भी इशारे जो नही समझे,
बड़ी सिद्दत से तुमको चाहती तुम ये समझ लो तुम,
की ज़न्मो साथ चलने का मैं वादा आज करती हूँ .....
 
 
शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(५-अक्टूबर-२०१३)

 

Saturday, September 21, 2013

ज़रा सम्भाल के ..............

 
 
 
 
                                             
यूँ प्यार में दामन छुड़ाया नहीं करते ,
करके वादे यूँ मुकर जाया नही करते,
खुदा भी रूठ जाता है ये अदा अच्छी नही है,
जो तुम्हे चाहे उसका दिल दुखाया नही करते,
ज़रा सी बात का यहाँ बन जाता है फ़साना,
सखी को भी दिल की बात बताया नही करते,
कोई हो जाये दीवाना समझ बैठे गलत मतलब,
सबके सामने यूँ मंद मंद मुस्काया नही करते .....