दरिया-ए मोह्हबत में कश्ती थी जवानी की,
ज़ज्बातें-तूफ़ान था इक अलग ही नज़ारा था,
महबूब था बाँहों में,हसरत थी निगाहों में,
एक सुरूर सा छाया था,लफ्जों में जो आया था,
ज़ज्बातें-तूफ़ान था इक अलग ही नज़ारा था,
महबूब था बाँहों में,हसरत थी निगाहों में,
एक सुरूर सा छाया था,लफ्जों में जो आया था,
उसकी नज़र ने पूंछा ऐसे ही इशारों में,
हमको भी तो बताओ किस कशमकश में हो तुम,
नज़रें झुकाके हसके हम उसको चूम बैठे,
बोले तुम्ही समझ लो क्या लफ्ज़ जरूरी हैं,
हमको भी तो बताओ किस कशमकश में हो तुम,
नज़रें झुकाके हसके हम उसको चूम बैठे,
बोले तुम्ही समझ लो क्या लफ्ज़ जरूरी हैं,
जब तार हो जुड़े एक दिल के दुसरे के ,
नज़रों ही समझ लो क्यों अलफ़ाज़ जाया करना,
वोह हँसके उसपे बोले इज़हार ज़रूरी है,
लफ़्ज़ों की रूहानियत का इकरार ज़रूरी है,
नज़रों ही समझ लो क्यों अलफ़ाज़ जाया करना,
वोह हँसके उसपे बोले इज़हार ज़रूरी है,
लफ़्ज़ों की रूहानियत का इकरार ज़रूरी है,
हमने भी बड़ी सिद्दत से उनको गले लगाके,
हलके से कान में फिर सब कह दिया की क्या है,
ये आँखें हैं मेरी दुनिया मुझे क्या कुछ जगह दोगी,
मुझे तुमसे है मोहब्बत,क्या साथ मेरा दोगी,
हलके से कान में फिर सब कह दिया की क्या है,
ये आँखें हैं मेरी दुनिया मुझे क्या कुछ जगह दोगी,
मुझे तुमसे है मोहब्बत,क्या साथ मेरा दोगी,
वोह फिर कुछ सोच के बोली की इतनी देर क्यों कर दी,
बड़े बुद्धहू हो तुम भी इशारे जो नही समझे,
बड़ी सिद्दत से तुमको चाहती तुम ये समझ लो तुम,
की ज़न्मो साथ चलने का मैं वादा आज करती हूँ .....
बड़े बुद्धहू हो तुम भी इशारे जो नही समझे,
बड़ी सिद्दत से तुमको चाहती तुम ये समझ लो तुम,
की ज़न्मो साथ चलने का मैं वादा आज करती हूँ .....
शैलेन्द्र हर्ष गुप्ता
(५-अक्टूबर-२०१३)
(५-अक्टूबर-२०१३)
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